शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

वह गोताखोर बनना चाहती थी

मेरे फेसबुक परिवार की अप्रतिम कवियित्री शैलजा पाठक  का सृजन अद्दभुत रहा है, कई बार उनकी रचनाओं को पढ़कर निःशब्द रह जाता हूँ, प्रसंशा के लिए शब्द खोखले ही साबित होते रहे हैं, गहरे उतर कर लिखी गयी उनकी रचनाएँ बहुत गूढ़ अर्थ लिए होती हैं... Shailja Pathak  को स्नेह सहित समर्पित मेरी कुछ पंक्तियाँ, बहुत कुछ कह सकने की उम्मीद लिए कुछ कह सकने का मेरा छोटा सा प्रयास है ....कवियित्री को मेरी शुभकामनायें.............

मुझे बताया था किसी ने
कि बचपन से ही वह गोताखोर बनना चाहती थी
बिल्कुल जलपरी सी दीखती थी वह
गहरे उतर जाने का हुनर तो उसे बखूबी आता था

समन्दर में उतरने से पहले
वह सोख लेती थी अपने हिस्से का समूचा आसमान
और निकल पड़ती थी एक अंतहीन यात्रा पर

वह जमा किया करती सुनहरी मछलियाँ,
समन्दर की सबसे कीमती सीपियाँ
और कुछ चमकते हुए सफ़ेद मोती

उन दिनों समन्दर समृद्ध था
उसके होने पर इतराता था

आज उदास है समन्दर
वह छोड़ आयी है समन्दर को
अकेले ही सिमटते रहने के लिए

लेकिन साथ ले आयी है वो
गहरे उतर जाने का हुनर

आज भी वह सोख लेती है
दूर-दूर तक फैली पड़ी संवेदनाएं,
उदासियों के कुछ सूखे हुए पत्ते ,
चारों ओर बिखरे पड़े मुरझाये फूल ,

वह गहरे... और गहरे उतरती जाती है
भरकर लाती है अँजुरी-भर मुस्कान
संग लेकर आती है सृजन के कुछ मोती अनमोल
और जलते हुए आशाओं के दिये
जगत के उस पार से...!!

                                         -अभिषेक शुक्ल

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

ईश्वर आज खतरे में है...

तुम लिखती रही हो जीवन ही,

तुम उधेड़ रही हो परतें,

उस रहस्य की ,

तुम समझ रही हो ,

उसकी कुटिल कलाओं को,

तुम स्वीकारने लगी हो ,

उसके आयोजन में,

हर एक दाँव को ,

तुम मुस्कुरा देती हो ,

उसके बन्धन ढ़ीले पड़ जाते हैं ,

देखोगे तुम,

वो हार जायेगा एकदिन , 

ईश्वर आज खतरे में है,

तुम जीत लोगी मृत्यु को भी ,

तुम मुस्कुराना सीख गयी हो,

जैसे मुस्काती है माँ,

बालमन की क्रीड़ाओं देखकर 

तुम जीवन लिखने लगी हो,

तुम लिखती ही रहना....!

                    - अभिषेक शुक्ल 


(शैलजा पाठक : एक बेटी की डायरी के माँ को समर्पित जीवन्त संस्मरण पर मेरी प्रतिक्रिया...एक छोटी सी कविता... !)

शुक्रवार, 31 मई 2013

तुम्हारी दिलचस्पी 
शब्दों में है
बेतरतीब उछाले गये शब्दों में
तुम खोजते रहे हो 
प्रेम !

अनिश्चित क्रम में लगे 
ताश के पत्ते 
तुम्हे आकर्षित करते रहे हैं
तुम मान बैठते हो 
उन्हें अपनी नियति
फेंटे जाने की औपचारिकता के बाद,

छिटक कर बिखर गयीं
कुछ तस्वीरों के कोलाज
तुम्हारी कुल जमा
जिन्दगी होती है,

और तुम भूल जाते हो
दो तस्वीरों की अनिश्चित
जमावट के बीचोंबीच
अनसुलझी पहेलियों को
बुदबुदाता हुया एक मन,

शब्दों को जोड़ती हुयी
मौन की एक अनचीन्ही रेखा
पर्याप्त है
आकाश की देह पर
प्रेम लिखने को !

- अभिषेक शुक्ल

गुरुवार, 14 मार्च 2013

मैजिक बुक

कविता

तुम मुझे 


बचपन के सुआपंखी दिनों वाली 


मैजिक बुक की ही तरह लगती हो


जिसके चटक सफेदी से पुते पन्नों पर 


हम बनाया करते लगभग एक जैसे चित्र


भरते कुछ रंग जाने पहचाने 


और गढ़ते कहानियाँ


जो भी हम देख पाते 


स्कूल की ओर बढ़ता हुआ रामू


दूर आसमान में पतंग धकेलता मोहन


पनघट से गगरी भर ले आती मीना


किसी मोड़हीन सड़क पर 


बढ़ते जाते जादुई चित्र


कदम-दर-कदम


पन्नों पर पाँव रखकर


और कह जाते कुछ अधूरी कहानियाँ


कविता


तुम भी तो सँजोए रहती हो


शब्द- चित्र 


दिखाती हो सचल दृश्य 


मैजिक बुक की ही तरह


आखीर में तुम छोड़ जाती हो एक प्रेरणा 


सुखान्त कहानी रचने की ...!!



                                                -अभिषेक शुक्ल 

सोमवार, 11 मार्च 2013

एक कविता तुम्हारी गुलाबी देह के पन्नों पर


सुनो,

तुम कहतीं थी न



कि मै तुम्हारे लिए कवितायें नहीं लिखता 

क्या तुम्हे याद नहीं 


तुम्हारे सोलहवें जन्मदिन की 


वह धूसर शाम 


जब क्षितिज की आड़ में 


तुम्हारी अधखुली पलकों पर उगे साँवले सूरज को



चूम लिया था मैंने 

काँपते, तप्त होठों से


तब लिखा था मैंने अपना पहला छंद 


और उस दिन जब मेरे बहुत कहने पर 


डरी,सहमी,सकुचाई सी तुम 


आ पहुँची थीं गाँव के बाहर उस टूटी हवेली में


वहाँ उस रेशम सी मुलायम चट्टान पर पसरी 


तुम्हारी गुलाबी देह के हर पन्ने पर


मेरी रेंगती उँगलियों के पोरों ने 

लिखी थी कोई कविता 


और तुम्हारी रिसती, नमकीन हथेलियों ने 


चट्टान पर उग आयी दूब को 


कसकर भींच लिया था


कितनी ही कवितायें लिखीं थी मैंने 


हम दोनों ने 


प्रेम की वह भरी पूरी किताब 


होली के रंग में रंगे दुपट्टे से लिपटी 


आज भी रखी होगी 


यादों की अलमारी की किसी दराज में 


तुम पढ़ो तो सही...


बोलो ...पढोगी न...?
                                 

                              - अभिषेक शुक्ल

शनिवार, 9 मार्च 2013

कलम की तिरछी झाड़ू से

पौं फटी जब
 
दूर उस क्षितिज


संतरी होता सा आसमान


रश्मियों की 


गूँजती किलकारियाँ


पक्षियों का


कलरव गान


एक सूखी सी नदी


रेत से सने उसके 

एक जोड़ी पाँव शुष्क किनारों तले


पसर आयीं गहरी मटमैली झुर्रियाँ


उलीच रही


कल रात उगाया खारा जल


समन्दर की


निष्ठुर हथेलियों में


लो, मैने भी


बुहार दिये


कविताओं के कुछ कण


कलम की तिरछी झाड़ू से


तुम्हारे मन की


चंचल तश्तरी पर...!!


                                      -अभिषेक शुक्ल 

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

स्त्री

स्त्री !

पित्रसत्तात्मक समाज की झूलती अरगनी पर 

टँगी मैली चादर सी 

जो कसी है मर्यादाओं,

रीति रिवाजों और कोरी सभ्यताओं की 

निष्ठुर चिमटियों से 

जिस पर फेंके जाते रहे ताश के पत्ते,

नीलाम होतीं रहीं तमाम द्रोपदियाँ, 

हर शाम सजतीं रहीं महफिलें,

पड़तीं आवारा पान की पीकें,

और धँसते रहे शराब के गिलास उन पर,

रात को वे मैली की जातीं रहीं


मर्दों के बिस्तरों पर


अगली ही सुबह चितकबरी चादरें


टांग दी जातीं वापस अरगनियों पर


चिलचिलाती रिश्तों की धूप में


फड़फड़ाते रहने के लिए ...!!


                                         - अभिषेक शुक्ल